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परीक्षाएँ नहीं, सीखना है जीवन का लक्ष्य— प्राभाकर उपाध्याय

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सूरजपुर- आज के समय में परीक्षा को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच अत्यधिक चिंता और तनाव का वातावरण देखने को मिलता है। अक्सर अंकों को ही सफलता का एकमात्र मापदंड मान लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि परीक्षाएँ जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि सीखने और स्वयं को बेहतर बनाने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण मात्र हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर भी “परीक्षा पे चर्चा” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि परीक्षा को बोझ नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखा जाए। विद्यार्थियों को यह समझने की आवश्यकता है कि परीक्षा उनके ज्ञान, समझ और आत्मविश्वास को परखने का माध्यम है, न कि उनकी संपूर्ण क्षमता का अंतिम निर्णय। आज की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में केवल अच्छे अंक ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। समय की मांग है कि विद्यार्थियों का ध्यान अंकों के साथ-साथ कौशल विकास पर भी केंद्रित हो। संचार कौशल, समस्या समाधान क्षमता, रचनात्मक सोच, नेतृत्व क्षमता, टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसे जीवन कौशल विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं। नई शिक्षा नीति और सीबीएसई भी अब इसी दिशा में कार्य करते हुए अनुभवात्मक शिक्षण, प्रोजेक्ट आधारित अधिगम और व्यावहारिक ज्ञान पर विशेष बल दे रहे हैं। अभिभावकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को केवल अधिक अंक लाने के दबाव में न रखें, बल्कि उनकी रुचियों और क्षमताओं को पहचानकर उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में सीखने और आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करें। वास्तव में, अंक सफलता का एक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन कौशल ही जीवन में स्थायी सफलता का आधार बनते हैं।

परीक्षा के समय विद्यार्थियों पर सबसे अधिक प्रभाव घर और विद्यालय के वातावरण का पड़ता है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की तुलना अन्य विद्यार्थियों से न करें। तुलना से आत्मविश्वास कम होता है और तनाव बढ़ता है। इसके स्थान पर बच्चों को प्रोत्साहित करें, उनकी मेहनत की सराहना करें और सकारात्मक माहौल प्रदान करें।

विद्यालयों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे केवल परीक्षा परिणाम पर ही ध्यान न दें, बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर कार्य करें। खेल, योग, ध्यान और सह-पाठयक्रम गतिविधियाँ विद्यार्थियों के मानसिक संतुलन और एकाग्रता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

आज के डिजिटल युग में विद्यार्थियों का काफी समय मोबाइल और सोशल मीडिया पर व्यतीत होता है, जो उनकी एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। परीक्षा के समय विशेष रूप से डिजिटल उपकरणों का सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग आवश्यक है।

संतुलित दिनचर्या — पर्याप्त नींद, पौष्टिक आहार, नियमित अध्ययन, छोटे-छोटे ब्रेक, योग और ध्यान — विद्यार्थियों को तनावमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।

नई शिक्षा नीति और सीबीएसई की मूल्यांकन प्रणाली भी अब केवल रटने की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर समझ, विश्लेषण, रचनात्मकता और व्यवहारिक ज्ञान पर जोर दे रही है। इसलिए विद्यार्थियों को केवल अंक प्राप्त करने के बजाय विषय को समझने और जीवन में उसके उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

जीवन में सफलता केवल परीक्षा के अंकों से तय नहीं होती। आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, समय प्रबंधन, अनुशासन और निरंतर सीखने की आदत ही वास्तविक सफलता की कुंजी हैं।

विद्यार्थियों की सफलता के लिए अभिभावक, शिक्षक और विद्यालय के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है। यदि तीनों मिलकर बच्चों का मार्गदर्शन करें, उन्हें प्रेरित करें और उनका मनोबल बढ़ाएँ, तो कोई भी चुनौती कठिन नहीं रह जाती।

परीक्षा जीवन की यात्रा का एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। इसे डर या दबाव के रूप में नहीं, बल्कि सीखने, आत्ममूल्यांकन करने और आगे बढ़ने के अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

हम सभी का प्रयास होना चाहिए कि बच्चों को ऐसा वातावरण मिले जहाँ वे बिना भय के सीख सकें, सोच सकें और अपने सपनों को साकार कर सकें।

आइए, हम सब मिलकर यह संदेश फैलाएँ —

“परीक्षा बोझ नहीं, अवसर है; अंक नहीं, सीख ही असली सफलता है।” 

— प्राभाकर उपाध्याय

सीबीएसई सिटी कोऑर्डिनेटर, सूरजपुर

प्राचार्य, साधु राम विद्या मंदिर, सूरजपुर

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