सूरजपुर के भैयाथान ब्लॉक में राजनीतिक हस्तक्षेप और तकनीकी विवाद के कारण अटका निर्माण
क्या नेताओं के ‘खास लोगों’ के मकान बचाने के लिए रोक दिया गया विकास?
सूरजपुर/भैयाथान- देश में चुनावी मौसम आते ही नेताओं की जुबान पर सबसे ज्यादा जो शब्द चढ़ता है, वह है — विकास। मंच सजते हैं, माइक गरजते हैं, नारियल फूटते हैं, फीते कटते हैं और जनता को भरोसा दिलाया जाता है कि अब गांव की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन भैयाथान ब्लॉक के गंगौटी-शिवपुर नवापारा मार्ग को देखकर ऐसा लगता है कि यहां विकास सड़क पर नहीं, सीधे राजनीति के दलदल में उतर गया है। करीब ₹7 करोड़ 40 लाख की लागत से बनने वाली यह सड़क आज खुद सवाल बन चुकी है। सड़क बनने से पहले ही राजनीति इतनी चौड़ी हो गई कि सड़क की चौड़ाई ही खतरे में पड़ गई। हाल यह है कि सड़क का तीन-तीन बार भूमिपूजन हो चुका है, लेकिन सड़क अब भी धरती पर उतरने का रास्ता तलाश रही है। पूर्व विधायक पारसनाथ राजवाड़े ने अपने कार्यकाल में दो बार भूमिपूजन किया। जनता ने सोचा — “चलो, पहली बार नहीं बनी तो दूसरी बार जरूर बनेगी।” फिर सत्ता बदली, नई सरकार आई, नई मंत्री बनीं, और वर्तमान कैबिनेट मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने भी उसी सड़क का तीसरी बार भूमिपूजन कर दिया। अब ग्रामीण सोच रहे हैं कि शायद सड़क बनने के लिए चौथा, पांचवां या दसवां भूमिपूजन बाकी है। गांव वालों का कहना है कि सड़क कम और भूमिपूजन ज्यादा हो रहे हैं। अगर इसी रफ्तार से भूमिपूजन होते रहे, तो आने वाले वर्षों में यह सड़क शायद “विश्व की सबसे ज्यादा भूमिपूजन वाली सड़क” का रिकॉर्ड बना ले।
विकास की सड़क या राजनीति का रनवे?
करीब 5 किलोमीटर लंबी और 10 मीटर चौड़ी इस सड़क को पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा बनाया जाना था। कागजों में सड़क पूरी रफ्तार से दौड़ रही है, लेकिन जमीन पर हालत यह है कि अधूरी रिटेनिंग वॉल, उखड़ी मिट्टी और धूल उड़ाते रास्ते ग्रामीणों का मजाक उड़ा रहे हैं, गांव के बुजुर्ग व्यंग्य में कहते हैं — “सड़क नहीं बनी, लेकिन नेताओं के भाषणों का ट्रैफिक खूब चला।” स्थानीय लोगों का आरोप है कि काम शुरू होते ही राजनीति ने ऐसा ब्रेक लगाया कि अब सड़क स्टार्ट ही नहीं हो पा रही, जनपद सदस्य राजू कुमार गुप्ता ने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए काम रुकवाया। गुणवत्ता पर सवाल उठाना गलत नहीं था, लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद सड़क दोबारा शुरू क्यों नहीं हुई? ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि मामला गुणवत्ता से ज्यादा “ठेकेदारी और हिस्सेदारी” का है। सूत्र बताते हैं कि सड़क निर्माण में स्थानीय राजनीतिक दखल इतना बढ़ गया कि विकास खुद किनारे बैठ गया।
सड़क के रास्ते में गड्ढा नहीं, ‘रसूख’ खड़ा है!
अब इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला हिस्सा सामने आता है, सूत्रों की मानें तो सड़क के स्वीकृत नक्शे और चौड़ीकरण की जद में कुछ रसूखदार लोगों के मकान और दुकानें आ रही हैं, यानी सड़क अगर नियम के अनुसार बनी, तो कई पक्के निर्माणों पर बुलडोजर चल सकता है, अब सवाल उठता है — क्या सड़क जनता के लिए बनेगी या नेताओं के करीबियों के घर बचाने के हिसाब से? ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ सफेदपोश नेताओं ने अपने “खास लोगों” के मकान बचाने के लिए पूरा निर्माण कार्य ही रुकवा दिया। मतलब जनता की सड़क रुके तो रुके, लेकिन खास लोगों की दीवार पर खरोंच नहीं आनी चाहिए, एक ग्रामीण ने तंज कसते हुए कहा गरीब किसान की जमीन सड़क के लिए तुरंत ले ली गई, लेकिन नेता जी के परिचित की दीवार के सामने सरकार का बुलडोजर भी लोकतंत्र सीखने लग जाता है।
अब सड़क नहीं, उसकी चौड़ाई काटने की तैयारी!
गांव में अब एक और नई चर्चा आग की तरह फैल रही है, कहा जा रहा है कि जिन हिस्सों में रसूखदारों के मकान आ रहे हैं, वहां सड़क की चौड़ाई ही कम करने की तैयारी चल रही है, यानी पहले सड़क का नक्शा बना, फिर सड़क पर मकान आ गए, अब मकानों को बचाने के लिए सड़क ही पतली कर दी जाएगी! वाह रे विकास! ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार होगा जब सड़क जनता की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि नेताओं के करीबियों की दीवारों के हिसाब से बनाई जाएगी, सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सड़क की चौड़ाई तकनीकी मानकों से कम की गई, तो भविष्य में दुर्घटनाओं और यातायात समस्याओं का जिम्मेदार कौन होगा?
गरीब किसानों की जमीन गई, मुआवजा अब तक गायब
इस सड़क निर्माण में करीब 57 किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई। किसानों ने विकास के नाम पर अपनी जमीन दे दी। उन्हें भरोसा था कि गांव में सड़क बनेगी, बच्चे स्कूल आसानी से जाएंगे, मरीज अस्पताल पहुंचेंगे और गांव का संपर्क मजबूत होगा, लेकिन हुआ क्या? न सड़क बनी, न पुल बना और न किसानों को मुआवजा मिला, किसानों का आरोप है कि जमीन लेने में प्रशासन ने फुर्ती दिखाई, लेकिन मुआवजा देने में सरकारी फाइलें कछुए की चाल चलने लगीं, एक किसान ने नाराजगी में कहा —”सरकार हमारी जमीन तो एक्सप्रेस स्पीड में ले गई, लेकिन मुआवजा बैलगाड़ी की चाल से भी धीमा चल रहा है।”
गोबरी नदी का पुल टूटा, लेकिन जिम्मेदारों की नींद नहीं टूटी
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर स्थिति गोबरी नदी के पुल की है। पिछले साल भारी बारिश में यह पुल क्षतिग्रस्त होकर टूट गया था, ग्रामीणों ने उम्मीद की थी कि प्रशासन तुरंत नया पुल बनाएगा या मरम्मत कराएगा, लेकिन यहां भी वही पुरानी कहानी दोहराई गई — निरीक्षण, आश्वासन और फिर सन्नाटा, आज तक पुल जस का तस टूटा पड़ा है, पिछले मानसून में ग्रामीणों को 10 से 12 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ी। कई बार मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सके। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई और छोटे व्यापारियों का काम ठप पड़ा रहा, अब एक बार फिर मानसून सिर पर खड़ा है, ग्रामीणों का कहना है कि अगर इस बार भी सड़क और पुल तैयार नहीं हुआ, तो करीब 10 हजार की आबादी का संपर्क कट जाएगा, सबसे ज्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को है, गांव के लोग व्यंग्य में कहते हैं सरकार शायद किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही है, ताकि फिर राहत शिविर लगाकर फोटो खिंचवाई जा सके।”
घटिया निर्माण का खेल: रिटेनिंग वॉल में सरिया गायब!
इस सड़क निर्माण में सिर्फ राजनीति ही नहीं, गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठ चुके हैं, जब निर्माण शुरू हुआ तो आरोप लगा कि ठेकेदार द्वारा बनाई जा रही रिटेनिंग वॉल में सरिया तक नहीं डाला जा रहा था, क्रेशर डस्ट और कमजोर सामग्री से दीवार खड़ी की जा रही थी, मीडिया में खबरें प्रकाशित होने के बाद विभाग हरकत में आया। इंजीनियर विनोद सिंह मौके पर पहुंचे और निर्माण कार्य रुकवाया, अमानक निर्माण तोड़कर दोबारा बनाने के निर्देश दिए गए, लेकिन सवाल फिर वही —क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए थी? क्योंकि काम रुकने के बाद दोबारा गति पकड़ने के बजाय पूरा प्रोजेक्ट ही ठंडे बस्ते में चला गया।
तीन बार भूमिपूजन: जनता पूछ रही — सड़क कब?
ग्रामीण अब खुलकर सवाल पूछ रहे हैं।
-अगर सड़क का तीन बार भूमिपूजन हो चुका है, तो क्या नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ नारियल फोड़ने तक सीमित है?
-क्या नेताओं के करीबियों के मकान बचाने के लिए 10 हजार लोगों की जिंदगी दांव पर लगाई जा रही है?
-अगर बारिश में रास्ता बंद होने से किसी मरीज की मौत होती है, तो जिम्मेदार कौन होगा?
-जब किसानों की जमीन ली जा चुकी है, तो मुआवजा भुगतान में इतनी देरी क्यों?
जनता कह रही — “हमें भाषण नहीं, सड़क चाहिए”
गांव के लोगों में अब भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब भाषण, भूमिपूजन और आश्वासन नहीं चाहिए, उन्हें सड़क चाहिए, पुल चाहिए और सुरक्षित आवागमन चाहिए, कई ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर मानसून से पहले निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो वे आंदोलन और चक्काजाम करेंगे, एक ग्रामीण युवक ने तंज कसते हुए कहा नेताओं के लिए सड़क सिर्फ चुनावी फोटो का बैकग्राउंड है, लेकिन हमारे लिए जिंदगी और मौत का रास्ता।”
विकास के नाम पर राजनीति का सबसे बड़ा गड्ढा
गंगौटी-शिवपुर नवापारा सड़क आज सिर्फ अधूरी सड़क नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जहां जनता की जरूरतें राजनीति के सामने छोटी पड़ जाती हैं, जहां गरीब किसान की जमीन आसानी से अधिग्रहित हो जाती है, लेकिन रसूखदारों की दीवार बचाने के लिए पूरा प्रोजेक्ट रोक दिया जाता है, जहां पुल टूटने के बाद भी व्यवस्था नहीं जागती, जहां सड़क से ज्यादा भूमिपूजन होते हैं, और जहां विकास का मतलब जनता नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण बन जाता है, अब देखना यह होगा कि प्रशासन मानसून से पहले जागता है या फिर इस बार भी बारिश के साथ ग्रामीणों की परेशानियां और सरकारी वादों की पोल दोनों बहकर सामने आएंगी।


















